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रचना 4154

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मैं रोज़ पुरानी होती हूँ पर मेरी आँखें रोज़ नई रहती हैं

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मैं रोज़ पुरानी होती हूँ पर मेरी आँखें रोज़ नई रहती हैं.... तुमको देखने के लिए देखना नहीं पड़ता ..... मुझे तुम्हें देखने के लिए एक एकांत सुनना पड़ता है। आंख मूंद कर कुछ देर बस बैठना होता है अपने पास ..... वक्त के पन्ने को पीछे .... बहुत पीछे ले जाकर उस जादुई पल को pin करना पड़ता है । उसे ठीक उसी तरह देखना पड़ता है ।उसी झांक की तरह आंखों के कोनों से तुम टप टप झरने लगते हो। तुमको खुली आंखों से ज़ाहिर किया जा सकता है और बंद आंखों से आज़ाद बस तुमको क़ैद नहीं किया जा सकता।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें