कल्पनाशब्दों के बीच
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अगर हम अपनी हड्डियों का चूरमा भी बना दें तब भी जिंदगी की कु…

अगर हम अपनी हड्डियों का चूरमा भी बना दें तब भी जिंदगी की कुछ ईंटे बन नहीं पाएंगी। ये बात मुझे 50 की उम्र के करीब पहुंचने पर समझ आई। धीरे धीरे लगने लगा की खुश होने और दुखी दिखने की कोई इंतहा नहीं है। Inner work करना चाहिए। कम लोग , कम जरूरतें, कम लाग लपेट । खुद पर ध्यान देना ,अपने शरीर और मन को दुरुस्त रखना खुद से बातें करना, सुनना अपने मन की,अपने एक कल्पना लोक का निर्माण करना ...वो करना जो तुमको ईश्वर के करीब ले जाए। तुमको ठगा सा महसूस न होने दे। वक्त के पश्मीना से कुछ धागे सिर्फ़ अपने लिए खींचना कोई मुश्किल नहीं । थोड़ा स्वार्थी होना अपने लिए जायज़ है। न काम कम होते हैं ...न चिंताएं ये रोलरकोस्टर राइड है। आप हवा में हैं... चाहे लटके रहो ... चाहे झूल लो.. चाहे उड़ लो जिंदा रहें। खुद से प्रेम कीजिए। सब कुछ निरंतर है। होकर ही रहेगा। आप स्थिर हो जाइए... चाहे लुढ़कते रहिए। मानिए कहा...जिंदगी कमबख्त है इससे इश्क़ इसी की भाषा में करना चाहिए। जियो जी भर के स्कूल जाते वक्त कार में आए ख्याल। शुभ दिन
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें