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कम लोगों के प्यार में बंधी हूँ

कम लोगों के प्यार में बंधी हूँ.... एक भी कम दिखे तो गिनती रहती हूँ। कैसे हो ? इतना भर पूछ लेने से अगर छू सकते हो उसको तो छूते रहना चाहिए। प्रेम ज्यादा भी हो तो कभी नहीं लौटाती...पर अगर कम लगे तो जी भर पुकारती हूँ। इधर प्रेम का लंगर चलता रहता। कौन ,कितना ,क्यूँ नहीं पूछा जाता। ऐसी ही रहूँगी😊 तुमको तो पता है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें