भाषा / Language
दिसंबर
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12 दिसंबर ...
जितनी दूर तक लिखते जाओगे....दर्द उतनी देर तक पढ़ा जाएगा।
लाओ..... संभाल कर रख दूँ...
ये कहते हुए रश्मि ने राज की ऐनक उतारी और उसकी डायरी परे रखनी चाही । राज इससे पहले कि कुछ समझ पाता उसकी कलम रश्मि ने अपने बालों में खोंस ली और राज का चेहरा दोनों हथेलियों में भर लिया । बस ज़रा सा उस पर झुक कर बोली कुछ देर के लिए ही तो आईं हूँ ...कुछ देर हो लो मेरे साथ ।
जब से आई हूँ तुम्हारे कमरे की उदासियाँ ही समेट रही। कौन इस तरह राख के बदले प्रेम की कतरनें लिख लिख कर ऐशट्रे भरता है?
ये गिलास देखो राज ....जम गया है, उस पन्ने पर जहां तुमने "सांझ का आगोश" लिख कर छोड़ दिया होगा।
ये दीवार तुम्हारी महबूबा है क्या?
कितना कुछ बचा रखा है तुमने इस पर?
हर मुलाक़ात को तारीख़ दीवाने बनाते हैं...
जानते तो हो तुम । फिर ये कैसी जिद्द है?
इन परदों और कमीजों के रंग सालों पुराने ही चल रहे अब तक।कुछ नए रंग ही खरीद लेते इन बीत गए सालों में।
और ये गुलदान ...ये चटका हुआ अब तक क्यों सँजो रखा है ? चटकी रुकी चीज़ें कौन रखता है भला दिल में? सूखे फूल तो बदल लेते यार।
ओहहो ! ये देखो शिउली के फूल भी कितने सारे सूखे हुए हैं दराज़ में। रोज़ किसी हिचकी को कौन संभालता है।तुम कैसे से हो राज?
रश्मि पूरे कमरे को हाथों से नहीं मानों धड़कनों से समेट रही थी।
दराज़ से एक ताजा शिउली का फूल हाथों में लेकर बस पलटने ही वाली थी कि लगा राज़ ने उसकी बांह मरोड़ कर उसके कांधे पर सर रख दिया है।
तुम क्यों चली आती हो मेरी उथल पुथल में ? जब तुम रुक नहीं सकती तो इतने सारे प्रश्न क्यूँ बोती हो?
क्यूँ हिसाब लेती हो मेरी उदासियों का ? क्यों चुभती हो मुझे ?
राज मेरी चूड़ियां .... मुझे दर्द हो रहा ... प्लीज रश्मि कुछ धीमे आवाज़ में बोली। जाने दो मुझे। राज उसे छोड़ना नहीं चाह रहा था और वो बस ठिठकना चाह रही थी।
"जाना इस दुनिया की सबसे कठिन क्रिया है ....my lord" और तुम वही हर बार कितनी आसानी से कर लेती हो... राज थोड़ा तल्ख़ होकर बोला।
इतनी नज़दीकियों की आदत रश्मि को रही नहीं थी और राज़ की ऐसी बातें को वो एक हल्के note पर खत्म करना चाह रही थी।
अच्छा बोलो क्या पियोगे ?
ऐसा कुछ जो ठंडी पड़ी मेरी रेत को सुलगा दे ... राज की नज़र अब भी रश्मि की कलाई पर गढ़ी थी जहां उसकी पकड़ के निशान उभर आये थे।
तब तो छल्ले फूंकने होंगे। सिगरेट अब भी कोट की दाई जेब में ही रखते हो या....? रश्मि ने कुछ प्रश्न और अपनी आंखों में टांगे और अपनी भवें मटकाने लगी।
राज़ ने कहा ...freeze । रश्मि वहीं बुत हो गयी। राज ने अपनी दाई कोट की जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाई फिर कुछ छल्ले रश्मि के रुखसार की और बढ़ा दिए। तुम्हारे सिवा कुछ नहीं बदला।
सब मृत है।
राज ने रश्मि के रात सरीखे बालों से कलम निकाली और सांझ कर दी। "कितनी खूबसूरत हो गयी हो तुम ." आँखों के अलावा सिर्फ कलम ने ही प्रेम को देखा ....चाहा.... लिखा और जिया है। काश तुम को कलम में रोक लेता हमेशा के लिए ...गुमख़यालों में राज बेखुद हुए जा रहा था।
इससे पहले की राज़ कुछ कह पाता रश्मि साइड टेबल के पास पड़े फ्रेम को उलट पलट रही थी।
ये क्या राज़ ? तस्वीर ही डाल लेते अपनी कोई।ये एक साल से खाली ही पड़ा है? रश्मि ने फ्रेम साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए पूछा।
देखो दिखेगी एक तस्वीर अभी... राज हंसते हुए बोला।पर कुछ सादगी को कैद करने वाले फ्रेम नहीं बनते रश्मि। उनपर बस रंग चढ़ता है।
"रंग" .... ये शब्द कितना जायकेदार है ना राज?
राज के छिपे तंज को छिपाने के लिए एक बार फिर रश्मि ने बात बदली ।
जायका तो तुम्हारे हाथों का नहीं चखा बरस भर से।
लेखक के किचन में हर डिब्बे में कविता और कहानी ही मिलेगी ...राज मजाकिया अंदाज़ में बोला।
और जो खाली होगा उसमें भर भर प्रेम ...रश्मि तुरंत चहकी।
हाँ ...मसालेदानी में नमक भी है बुरक लो....बुरक लो...राज का ये ताना था या जुमला पुराना वही जाने।
दो प्याली चाय कब चढ़ी ,कब उबली, कब खौली और कब दोनों के बीच आगयी पता ही नहीं चला।शायद मुलाकातों में भी pause या interval होते होंगे।
ये सादे रंग जानबूझकर पहनती हो या मुझे कष्ट देना भाता है तुम्हें? चाय के कप के उसपार बैठी रश्मि से नाराज़गी जताते हुए राज ने पूछा
ओहहो राज ... मिठास देखो चाय की ।रंग तो बस उड़ने वाली शे है।
उड़ने वाली शे? कैसे
जैसे मुझसे उड़ गए पलक झपकते ही उस रोज़।
अतीत ...तीन शब्दों से भले ही बनता हो पर ज़माने भर के एहसास साथ लपेटे चलता है।
रश्मि का अतीत लाल से काला और फिर सफेद ऐसी जल्दी में हुआ कि पलक भी कोई क्या झपके उसकी आंखों में पिछले कई साल तैर गए।
दुःख ... दो अक्षरों के बीच दो बिंदु वाला सिरा जो पकड़ाए नहीं पकड़ा जाता।
ठीक एक साल बाद
आज इन आँखों ने "इंतज़ार" उतार कर "सुकून" पहन रखा है .......
खुश आंखें छू कर आयीं हैं
शायद .....कोई अजनबी चेहरा... एक पुरानी हंसी से बना।
वो खिड़की के पार बादलों से बात करने लगी।
"उस चिड़िया को देख रहे हो ...राज। उसका एक मदारी था। था तो था... अब चिड़िया के पंखों में बागी तितलियाँ उग आयी हैं।" खुश रहने के लिए मन तो बढ़ाना ही पड़ता है कदम बढ़ा लेने के बाद। रश्मि मन ही मन सोच रही थी कि क्यों ख़ाली हो रही है वो जाने अनजाने इस तरह ।
"आओ यहां बैठो .... साल भर बाद मिली हो कुछ तो सज़ा मुकर्रर हो तुम्हारी"... राज ने रश्मि की उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसा ली और उसे पास लॉन में रखे झूले पर बिठा दिया। खुद झूले को सामने से धकेलने लगा। फिर मुस्कुराते हुए बोला रश्मि तुम्हें अपनी तरफ आता हुआ देखना कितना खूबसूरत है और जा कर लौटते हुए देखना उससे भी खूबसूरत।
तुम आ क्यूं नहीं जाती ? सारे रंग और शब्द ...
सारी खुशी और खलिश तुम्हारे नाम की ही तो हैं।
मैंने तुम्हें कभी भी प्रार्थनाओं में नहीं रखा .......
पहले ज़िद्द में रखा
आजकल वो धैर्य में रुका हुआ है.... ये खुद से बोल देने की बेतुकी आदत राज की। काश बोल देता उस रोज़।
बस आंखें बोल रही थी उसकी जो रश्मि अक्षर दर अक्षर decode कर रही थी।
ये शब्दों की गिलहरियाँ न दिया करो... देखो गुदगुदा गयी न? शर्माते हुए रश्मि झूले से उचक कर राज की तरफ चलने लगी।
बेहद पास आकर बोली...
खुद से सच्चा होने के लिए हमें बहुत सारे झूठ पार करने पड़ते हैं।
मुझे तैरना आता है .... तर ना नहीं।
झूला रुक गया ।राज़ रश्मि की ऐसी ना हर बार सुनता था। वो कायम रहती हर बार।वो टूट जाता हर बार।
इस बार फिर 12 दिसंबर की तारीख आगे बढ़ गयी। कोई रुका नहीं ।कोई चला नहीं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें