भाषा / Language
हम दोनों जानते थे
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हम दोनों जानते थे ....
हम खाली हाथ हैं.... दोनों एक दूजे को कुछ नहीं दे पाएंगे।
फिर भी कभी मैं उसे *अच्छी* लग जाती
हूं।
कभी वो *अच्छा* बन जाता था मेरा।
संवेदनाओं के कुछ सिलसिलों में *है* और *था* बेमायना लगते हैं।
हम मिलते,बिछड़ते,हंसते ,उदास होते
पर जाने क्यों कभी टूटे नहीं। हमें लंबी दूरी से प्रेम था। मंजिल गुमशुदा ही भली रही।
इस सफर में
बाध्यता और बिंधने में अंतर है ...
उसने सिखाया ....
मैंने चुपचाप सुना
माना उसका कहा...
हुबहू कर दिखाया।
बिंधी रही ...बाध्यता के बिना।
अब महसूस होता है....
दरख़्त कहीं भी लगे हों....हवा ,पानी,ताप कॉमन है।
प्रेम भी कुछ कुछ ऐसा ही है
दो अच्छे लोगों के बीच का कॉमन
अब हमारे पास दोनों का मिला कर एक मन ,एक स्पर्श,एक स्नेह,एक याद,एक ठौर और एक ही सफ़र है।
मुझे पता है.... सफ़ेद कुर्ते की बांह मोड़ना पसंद है उसे
उसे पता है.... विक्की कौशल कितना ज्यादा पसंद है मुझे।
*लिखना मेरे लिए मुस्कुराना भर है। अकेले।
जी भर मुस्कुरा रही अभी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें