भाषा / Language
मेरे इश्क़ की तासीर भी गज़ब है
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मेरे इश्क़ की तासीर भी गज़ब है
उसी के लिए रोता है.... जिससे दुखता है।
मुझे उसके नाम के आगे पीछे कितने ही प्रश्न , कितने ही लांछन ,कितने ही आक्षेप,कितने ही धब्बे सुनाई देते हैं।
मैं कई बार कान बंद कर लेती हूं।कई बार ज़ुबान।कई बार मन।
पर उसको नकार नहीं पाती। मैं खुद अपनी आंखों से देख पाती हूं कि पल पल ठग रहा वो मुझको । मुझे दिखता है उसका जाना और जाते ही रहना।
पर मैं रोज अपनी टूट भूल जाती हूं।
मेरा मन उसे किसी हाल बैरी नहीं मानता ।
हर बार कोई बात नहीं कल्पना कह देता है।
मुझ पर पत्थर पड़ जाना चाहिए।
मुझे भी आराम आना चाहिए।
एक रोज़।
तुमको लगन भेजी है अपनी...
लग जाए काश।
तुम भी मुझ सा दुखो।
तुम?
तुम मेरे दिल हो।
*तस्वीर आज स्कूल की है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें