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आंखें सोचती हैं कविता

आंखें सोचती हैं कविता मन देख सकता है उनका सोचा हुआ । अंगुलियां लिपिबद्ध करती हैं देखा हुआ मन कवि तो बस हस्ताक्षर करता है... कुछ मनके
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें