कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4014

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ऐसा हम अक्सर सब के लिए नहीं लिख पाते .... तुम मेरे पास होते…

ऐसा हम अक्सर सब के लिए नहीं लिख पाते .... तुम मेरे पास होते हो तो कोई दूसरा नहीं होता। तुम्हारे लिए लिख रही हूँ। हमेशा लिखूँगी। शब्दों का सिरा पकड़ कर धीरे धीरे एक दूसरे को समझने के लिए बहुत सारा धैर्य चाहिए । इस धैर्य में मन से ज्यादा मैंने तुम्हारी आँखों को पढ़ा ।ये जब मुस्कुराती हैं तो मेरे आसपास की धुन्ध हट जाती है । सुकून महसूसना सीख गई हूं। अब तुम्हारा न होना खलता है। ये शिकायत कतई नहीं है ये उन बहुत सारी चाहनाओं की अरज है जो अगर मैं कह न पाऊँ तो मेरे शब्दों में पढ़ लिया करना। इज़हार कब लिखा जा सका है जो पढ़ा जा सकेगा ।इसे फ़िज़ा में घुला रहने दो। मुझे आसपास बसा रहने दो । शुक्रिया💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें