कल्पनाशब्दों के बीच
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सब दोस्त ढूंढते हैं

सब दोस्त ढूंढते हैं.... मेरी आँखें दोस्तों में मनुष्य ढूँढती हैं। जिसमें जितना ज्यादा मनुष्य दिखता है, मैं उसकी उतनी ज्यादा होती जाती हूँ। ये बात बताने वाली कत्तई नहीं है बस महसूस की जाने वाली है। जिसे पसंद करती हूँ ...खुलकर कह देती हूँ। बार बार कहती रहती हूँ।हमेशा कायम रहती हूँ। मेरा प्रेम उनसे उनकी मनुष्यता का एक मात्र कारण है। ऐसे दोस्तों के पास मैं खुद पहुंचना पसंद करती हूँ ताकि उनसे कुछ सीख सकूँ। उनकी चमक में घुल सकूँ। सादगी जी सकूँ। बस इसलिए मेरे कम.... बहुत ही कम दोस्त हैं जो मेरे लिए मेरा सुकून हैं। उनको खो नहीं सकती। चाहे जो हो। तुम रहोगे मेरे हमेशा । मैं रखूंगी तुम्हें।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें