कल्पनाशब्दों के बीच
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मलंग शामों में क्या मांगती रहती हो कल्पना

मलंग शामों में क्या मांगती रहती हो कल्पना ? एक शोर जो उलीच दे मेरे मन का सन्नाटा *ज़ुल्मी तुम ... पर दिलकश है ये तुम्हारी भेजी उदासी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें