कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3883

भाषा / Language

आंखों में जिस रोज़ काजल नहीं होता उस रोज़ उदासी जरूर भरी होती…

आंखों में जिस रोज़ काजल नहीं होता उस रोज़ उदासी जरूर भरी होती है। बरसों का सच आज भी गहरा है.... आंखें याद रखती हैं। तुम भूल जाते हो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें