भाषा / Language
मैं कहां जाऊंगी
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मैं कहां जाऊंगी?
तुम आत्मा में छप गए हो।
एक यही पता मेरे पास है।
जानते हो...
मेरे लिए मैं काफ़ी हूं।
जब कभी तुमको दस्तक देती हूं तो ये कभी न सोचना कि तुमको मांगने आई हूं।
तुमको तुम्हें ही लौटाने का मन होता है।
तुम असीम हो मेरे पास।
अपना आप लेने जाना हो कभी तो आना मेरे पास। इक तुमसे लथपथ मन के अलावा मेरे पास कुछ है भी नहीं तुमको देने के लिए।
इधर इस पते पर ना और हां के डाकिए नहीं आते।
सिर्फ़ आशियाना ढूंढते मन आते हैं
हक़ से।
तुमको जगह दी है।
आत्म और आत्मा में
आओ ...
ना भी आओ....
रहोगे तुम ही।
*ईश्वर से मांगा है तुम्हें । वही मेरा सफ़ेद कबूतर है। सही संदेश लाता है।
प्रेमिल रहो कल्पना।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें