भाषा / Language
अक़्सर सोचती हूँ उससे पूछ कर देखती हूँ याद आती है
✦
अक़्सर सोचती हूँ उससे पूछ कर देखती हूँ याद आती है?
फिर सोचती हूँ इस प्रश्न को पूछकर मैं क्या पा लूंगी?क्या मैं उसके हृदय की कील थी कि टंगी रहूं? अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने की कवायद क्या ठीक है?
हम क्यूँ याद में बने रहने की बात करते हैं? क्या जीवन दो पहियों पर चलता हुआ गोते खाने लगता है कि याद का lifejacket निकाल कर उसमें हवा फूंकनी पड़ती हो। हम को आदत है पसर जाने की। हम बार बार प्रेम में नब्ज़ क्यूँ छूते रहते हैं? प्रेम चल रहा है न?
क्यों रसीदी टिकट चाहिए कि प्रेम की डाक हर पल आये।बस उसके दिल पर मैं ठप्प- ठप्प पड़ती रहूं। प्रेम घड़ी में तुम - तुम ही क्यूँ बजे ? हर साज .....याद आ रही है ही क्यूँ बजाए?
प्रेम एक मखमली सिरहाना ही नहीं एक बेहद सुरीला मोरपंख भी है जो मेरे और तुम्हारे बदन पर अपना रंग छोड़ता जाता है। याद महावर और मेहँदी है जो छूटने के लिए ही बनी है।
याद में हम मुस्कुराते हैं.... हम रो लेते हैं। हम खीजते हैं.... कई बार उलाहना भेजते हैं ।कई बार असहाय बेहद शिथिल हो जाते हैं ।ये याद के सारे रूप अदृश्य ही अपने पूरे यौवन में खिलते हैं। आप को धड़कन तक महसूस होती है अपनी। याद धारदार चाकू है।आर पार होकर ही रहता है।
एक रोज़ मैंने उससे कहा....
कम कम में समा जाने वाले प्रेमी क्या याद नहीं आते?
उसने कहा...
प्रेमी बस हैं.....
जैसे तुम हो.... मैं हूँ
याद एक खिलौना है।
चाबी से चलता है।
मैं और तुम दिल से।
अब सो जाओ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें