कल्पनाशब्दों के बीच
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जिस रोज़ अच्छे से भूल जाओ उस रोज़ दस्तक देना।

जिस रोज़ अच्छे से भूल जाओ उस रोज़ दस्तक देना। मैं तुम्हें पुराना नाम ,पुराना पता नए संबोधन के साथ दूंगी। कुछ लकीरें न बड़ी की जा सकती हैं ना छोटी वे बस खींची जा सकती हैं आर पार ढलती शाम को सब उदासीन बातें किया करते हैं .... जैसे आसमान जैसे लहर जैसे समंदर जैसे रेत जैसे इन सब में बचा प्रेमी मन *तस्वीर देख कर आया ख्याल। समुंदर सिंगापुर का है । उदासी खालिस देसी है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें