कल्पनाशब्दों के बीच
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गुस्ताखियाँ ही करती हूँ कागज़

गुस्ताखियाँ ही करती हूँ कागज़ पर ... पढ़ ली गईं तो रस्म है। छू ली गईं तो नज़्म हैं। आज बनते बनते ये बन गया। रंगों से खेलना आपको ख़ाली कर देता है। आप रंग कर मन का शोर कागज़ पर धर सकते हो । मुझे चित्रकारी आती नहीं ।सबसे ठीक बात ये है कि प्रयास करने में डर भी नहीं लगता।वक्त कट जाता है । मन बंट जाता है। गीत हेडफोन में ...तेरा चेहरा जब नज़र आए लूप में चलता रहा। दिन कट गया ।शाम पौधों के साथ बीतेगी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें