भाषा / Language
मैं दरवाजे पर खड़े रहकर जिंदगी का इंतजार नहीं कर सकती
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मैं दरवाजे पर खड़े रहकर जिंदगी का इंतजार नहीं कर सकती
ये सब बहुत पीछे छोड़ आई हूं ।
मैं खुद प्रतीक्षा हूं
प्रेम में थक्का हूं।
अपनी उदासी अपनी खुशी बारी बारी
फानते...फानते मैं सब्र की डली हो गई हूं।
मैंने मठ्ठा होना छोड़ दिया....
कब का
* टूट कर में ज्यादा खूबसूरत हूं
मुझे अब खौफ नहीं आता
प्रेम को काटा नहीं है खुद में
काट दिया है खुद से ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें