कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3635

भाषा / Language

मैं दरवाजे पर खड़े रहकर जिंदगी का इंतजार नहीं कर सकती

मैं दरवाजे पर खड़े रहकर जिंदगी का इंतजार नहीं कर सकती ये सब बहुत पीछे छोड़ आई हूं । मैं खुद प्रतीक्षा हूं प्रेम में थक्का हूं। अपनी उदासी अपनी खुशी बारी बारी फानते...फानते मैं सब्र की डली हो गई हूं। मैंने मठ्ठा होना छोड़ दिया.... कब का * टूट कर में ज्यादा खूबसूरत हूं मुझे अब खौफ नहीं आता प्रेम को काटा नहीं है खुद में काट दिया है खुद से ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें