कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3579

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तुम इक पल में बहत्तर बार धड़कते हो मुझ में

तुम इक पल में बहत्तर बार धड़कते हो मुझ में ये शोर चुप्पी के बहत्तर नुपुर एक साथ पहनता है हर पल रास है इश्क़ होने में ना होने का ना होने में होने का आभास है इश्क *मधुप मुद्गल जी की आवाज में हमन है इश्क मस्ताना सुन रही...अहा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें