कल्पनाशब्दों के बीच
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पानी सा रखना मुझे

पानी सा रखना मुझे..... बचा कर सबसे छिपा कर एक रोज़ मैंने उसे खुद को सौंपते हुए कहा। छिपा ही रखा है ... तुम होकर भी होती कहां हो कल्पना ? उसने ये कह कर मेरा होना ही नकार दिया। मेरी सौंप बिखर गई। बाद बरसों तक रखा रखा पानी एक रात इत्र हो गया। मैं मिल गई और वो खो गया। *अभी चेहरे के आधे हिस्से को धूप चूम रही। आधा मायूस हिस्सा तुम्हारे लिए रख छोड़ा है चांद। आधा आधा एक पूरा वैसे भी नहीं होता। दिन शुभ रहे । तस्वीर अभी स्कूल जाते वक्त की है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें