भाषा / Language
जरूरी और जरूरत का अंतर बस ख़ालिस आंखें देख सकती हैं और सुच…
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जरूरी और जरूरत का अंतर बस ख़ालिस आंखें देख सकती हैं और सुच्चा मन सुन सकता है।
ये* हां ना* की जादूगरी भी सब के बस की बात नहीं । आप हर वक्त अय्यार रहें ...ये धोखा है।
आप प्रेम का आभास सब को देते रहें और खुद को प्रेमी कहें .... बेहद गलत है।
अमरबेल समय रहते काट देनी चाहिए वर्ना दुःख रिसता रहता है।
प्रेम करने से ज्यादा प्रेमिल मन को सावधानी से नकारना भी एक दुआ लगने का काम है। सच कह कर दिल तोड़ देना चाहिए। झूठ को पहाड़ बनाना बोझिल काम है।
प्रेमी ना सुनने के आदी हैं
जंगली फूल हार नहीं मानते
ना रेत में उगे कैक्टस
जब दिन रात बदलते हैं तो प्रेम भी बदलेगा।कभी तो मिलेगा।
कहो नहीं....
बार बार *नहीं तो * कहने से लाख गुना आसान है।
प्रेमी लोगों.....
बक्श दो...
सच कहा करो।
*तस्वीर अभी स्कूल जाते वक्त ली है । मन भी बस अभी लिखा है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें