ककल्पनाशब्दों के बीच
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रात कितनी भी देर में खत्म हो मेरी सुबह जल्दी ही शुरू होती ह…

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रात कितनी भी देर में खत्म हो मेरी सुबह जल्दी ही शुरू होती है। चार- साढ़े चार बजे अपने आप नींद खुल जाती है। मुझे हमेशा अगला दिन शुरू करने की जल्दी रहती है। अपने पास रहने की एक उत्सुकता बनी रहती है। जितने देर नींद के पास होती हूँ फिर किसी के पास नहीं होती। सपनों के भी नहीं। मुझे ख़्वाब ना के बराबर ही आते हैं।शायद दिन में ही सारे देख डालती हूँ 😊 कुछ नहीं होता करने को सुबह... पहली चाय भी अकेले ही पीती हूँ सिर्फ़ अपने साथ। योगा कर लिया ,किताब छू ली,एक पसंदीदा प्लेलिस्ट सुन ली... कुछ लिख लिया fb स्क्रॉल कर लिया। दो गीतों से अक्सर दिन शुरू होता है .... ये नयन डरे डरे ...मुझे जीने दो और दिन रात बदलते हैं...हालात बदलते हैं। ये कई सालों का सिलसिला है। ये गाने , ये सुबह का रूटीन देख सुनकर विनोद चिढ़ाते भी हैं...पूजा कर ली? भजन सुन लिया😊😊 मेरे पास ईश्वर, तुम, घर ,स्कूल ,किताबें,गमलेबानी और ऊल जलूल लिखने के अलावा कोई काम नहीं। कुछ दोस्त ....वो भी इतना कम बोलने वाले कि क्या ही कहूँ। कम संवाद ज्यादा सुख का मन्त्रा मिलता हो जिनसे। खुद के पास ठहरना सिखा दिया हो जिन्होंने । सदा रहें । मेरे पास खुद में खोए रहने का वक़्त ही वक़्त है। दुनिया बेहद सुंदर है ।इसे ज्यादा देखना पढ़ना अच्छा लगता है। दुनिया बहुत छोटी पसंद है ...बस उतनी कि हाथ बढ़ा कर तुमको छू सकूँ। ज्यादा हसरतें ...ज्यादा चाहनायें रख नहीं पाती। पर जो रखती हूँ उन जैसा फिर कोई नहीं रख सकता।😊 मुझे एक बार भव्या ने law of attraction के बारे में बताया था। उसे follow करती हूँ। सच है ये काम करता है। आप की सोच बदल के रख देता है। आप होता हुआ देखते हैं अपना मन। एक उपासना की तरह बीतने लगता है दिन। आप जो चाहते हैं कि ये हो जाये.. वो यकायक होता हुआ लगता है। ईश्वर रास्ता बनाता जाता है। मैं इस खुशी को लिख नहीं सकती। पर बनते हुए रास्तों को देख रहीं हूँ। रोज़ ज़रा ज़रा। बात इतनी सी है कि जाने अनजाने उठते बैठते सोते जागते बस एक ही धुनकी रखो।डूबे रहो। उसी में घूमो...गोल गोल। इसे समझना नहीं होता...करना होता है। फिर ये मन में होता जाता है। एक रोज़ इसे करना भी नहीं होता। मन बस वहीं रम जाता है...मछली की आँख पर।फिर अर्जुन को तीर नहीं साधना पड़ता। तीर का तय हो जाता है आँख तक पहुंचना । मैं साल दर साल दूरी तय कर रही हूँ।ये सिर्फ़ मुझे दिखता महसूस होता है।😊😊😊 खुद से बातें करने के लिए ये समय कितना सही है.... कोई नहीं पूछता क्या कर रही हो कल्पना? किसके साथ बात कर रही हो? कौन है उस तरफ? अपने साथ खुद में कौन होगा रे तुम हो।😊 और इतनी बातों में चाय का ये खाली मग।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें