भाषा / Language
मुझमें बहुत सा पुरुष छिपा है बस बाहर नहीं आने देती कि जान ग…
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मुझमें बहुत सा पुरुष छिपा है बस बाहर नहीं आने देती कि जान गयी हूँ ......
मेरा स्त्री होना मुझे ज्यादा श्रेष्ठ बनाता है।
*तीन चौथाई हिस्से " कौन "
और
एक चौथाई हिस्से "मौन"से बनी हूँ
फिर भी
छप ही जाती हूँ ...... जन से जीवन तक
ये जादू नहीं
सिर्फ
एक प्रयास है मेरा
इस बात को परिभाषित करने का
कि वजूद का ...
कोई लिंग
कोई रूप
कोई रंग
कोई आकार
कोई आवाज़ नहीं होती
बस नीयत होती है ....... "मैं" हो जाने की ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें