भाषा / Language
अब मन काठ का कर लिया है तो गुलाब फूलदान में रख दिए हैं।
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अब मन काठ का कर लिया है तो गुलाब फूलदान में रख दिए हैं।
दुःख सजे हुए सुंदर लगते हैं।
प्रेम की बात और है।
पोस्ट पिछले साल आज ही लिखी थी ।
दिन महीने साल गुजरते जायेंगे।
*आज तुम्हें काठ के गुलाब भेजे हैं।
अक्सर ये सोचती थी कि अगर कभी तुमसे मिली तो क्या दूँगी?
कल मंदिर से लौटते हुए इन पर नज़र पड़ी।बरबस तुम्हारा ख़्याल आया कि बस यही दूँगी तुम्हें।
सूखे काठ के गुलाब ...
ये देखने में गुलाब जैसे हैं पर पहाड़ों में इन्हें थीटा कहते हैं। फूल जैसे बीज शायद जो सूख कर दरख़्त से गिरते रहते हैं।
इन्हें हाथ में लेते ही ख़्याल आया कि जो पहले से ही सूख कर खूबसूरत है वो कितना नायाब होगा।
बेफ़िक्र
बेख़ौफ़
जिसे अब कोई हाल सूखने ,टूटने ,मुरझाने ,गिरने ,रूठने और मनाने जैसा कुछ महसूसना न होगा।
मैं भी इतने बरसों में प्रेम में ऐसे ही हो गयी हूँ। शायद तुमने बना दिया😊
क्या खो दूँगी जो पाया है ?
क्या पाऊंगी जो खो दूँगी?
तुम्हारी दी ...न दी हुई तसल्ली इन गुलाबों की महक है। इनकी खुशबुएँ मुझमें रंगत लाती रहेगी।
रख लो😊😊😊
एक रोज़ ये काठ के गुलाब भी नहीं रहेंगे...
पर मैं रहूँगी यहीं
चुपचाप
मेरे लिए प्रेम का हासिल यही है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें