कल्पनाशब्दों के बीच
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तुमने मुझे प्रेम कभी न दिया

तुमने मुझे प्रेम कभी न दिया पर उसका एहसास दिया.... यहीं तुम पराजित हुए और मैं अर्जित हुई। परिमार्जित कल्पना तुम्हारी हर चाप मेरी हुई हर चराग मेरा हुआ तुम्हारे तक हर आना मेरा हुआ तुम्हारी हर उदासी मेरी हुई। *वो नहीं मेरा मगर उससे मुहब्बत है तो है। दिल्ली लौट रही बेहद शानदार गजल बज रही। गुलाम अली जी जानते थे गुलाम बनाए रखने का फन तुम्हारी तरह। सुनिए तो ज़रा...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें