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डर लगता है

डर लगता है ..... उन किरदारों से जो तरह - तरह के मुखोटे साथ लिए फिरते हैं "अदृश्य से " बस उभरने वाले परिस्थति के नहीं , अपनी स्वार्थ अनुरूप मुखोटे का इक बटन दबाकर कमाल की अदाकारी पेश कर खुद को पीछे धकेल कर हद दोगले होकर जीव निर्जीव सबको लुभा कर ये कायल कर जाते हैं जानती हूँ मुखौटे "मूक" होते हैं पर यहाँ तो मुखौटे "मौकापरस्त" हैं और अभ्यस्त भी .... मन के ज़हर पर जुबां का शहद मल कर जोड़ तोड़ वाली गणित कर कर चरखे की तरह सतत चल कर नए नए जाल बुन कर सादी सी मछलियाँ फांस कर ये घायल कर जाते हैं कभी सोचती हूँ .... ये जहर लगे मुखोटे सो कैसे पाते है ? किसी के हो कैसे पाते हैं ? इतना भार ढो कैसे पाते हैं ? उतर जाने के बाद सिरहाने में रखे ये मुखोटे चुभते जरूर होंगे कभी उनके दिल को कभी उनके दिमाग को और अभी कभार उनकी आत्मा को भी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें