भाषा / Language
ना हां रखने के लिए हथेलियां दी उसने कभी
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ना हां रखने के लिए हथेलियां दी उसने कभी
न ना लिखने के लिए पीठ कभी
मन कहने की जगह भर दी है
बालिश्त भर
उसने
दरख़्त का वो रंध्र
जहां से मेरी हां को न कभी हां मिली
न ना ही मिली कभी मेरी हां को
पर अथाह कुछ मिला
क्या... ये ठीक ठीक मैं भी नहीं जानती।
एक पता
जहां अंतस बह जाता है।
मेरी सौंपने की जगह।
उम्र भर की हैरानी परेशानी रखने का आला मेरा।
ये प्रेम कभी नहीं लगा मुझे
प्रेम की राह लगी मुझे
पार नहीं पहुंचना मुझे
ऐसे ही ठीक है ।
अच्छा है बस फड़फड़ाते रहना।
प्रेम मिल जाना भी मृत्यु सा है
बस एक बार
बस......।
वो गूंज बुझ जाती है
मुझे अनुगूंज बक्श दे।
मैं लौट सकूं
हर बार
हर दिशा से
इस बची उम्र में
तुम तक।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें