कल्पनाशब्दों के बीच
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गुम हुई चिट्ठी हूं

गुम हुई चिट्ठी हूं.... इक रोज़ पहुंचूंगी तेरे शहर तब तलक मुल्तवी रहना तुम बस मेरे लिए। *कल अतरंगी रे देखी। इस गीत पर झर झर रोई। प्रेम की बेबसी सबसे बड़ा दुःख है। निसहाय महसूसना उससे भी गहरा टीस देता घाव । रहमान जी को गीत के लिए दुआ पहुंचे। सांझा कर रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें