कल्पनाशब्दों के बीच
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ये तुम हो ना

ये तुम हो ना? क़ैद, उदास, एकाकी पर... मेरे । कई बार रोना रह जाता है । कई बार मिलना .... प्रेम की आंखों ने कुछ भी तो नहीं सीखा सलीके से। कल रात की उथल पुथल सुबह सुबह इस नजारे ने पोंछ दी। आबाद रहिए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें