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मेरे तुम्हारे पास मोती के दाने थे

मेरे तुम्हारे पास मोती के दाने थे .... तुम इसे सुबह की ओस शाम की नमी कहते रहे। मैं उन्हें पलकों की नज़्म कहती रहती। प्रतीक्षा को हँसी के धागे में पिरो दो तो दर्द का रिश्ता बड़ा होता जाता है। तुम्हारे नाम इल्ज़ाम रहे मेरे नाम का मेरे सर तुम्हारा नाज़ रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें