कल्पनाशब्दों के बीच
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हम क्या मांगते हैं प्रेम में

हम क्या मांगते हैं प्रेम में ? स्थिरता .... वो भी प्रवाहमयी *बरसों से तुम्हारे मेरे बीच एक ख़ामोश सफ़र बहता है। रोज़..... दो नाम पार लग जाते हैं दो शहर डूब जाते हैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें