कल्पनाशब्दों के बीच
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पहाड़ तुम तक नहीं आ सकते ....पर मैं ला सकती हूँ😊

पहाड़ तुम तक नहीं आ सकते ....पर मैं ला सकती हूँ😊 कल्पना हूँ ना बहुत मन है कि एक रोज़ पहाड़ी धूप तुम्हारी गोद में रख दूँ। कहूँ कि ये जो ठंडक है ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए बचा कर रखी है । इस हरियाली पर सिर्फ़ तुम्हारा नाम लिखा है। ये सब एक बार को तुम जी भर स्पर्श कर लो। शुभदिन। तस्वीरें अल्मोड़ा के घर से छत से बस थोड़ी देर पहले मैंने ली हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें