भाषा / Language
बस अपने ही खाँचे में ठहरता नहीं मन
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बस अपने ही खाँचे में ठहरता नहीं मन .....
ना मुन्सिफ़ ही रहे ....
ना मुनासिब ही हुए
आज इधर बारिशें हैं
बेवक्त
बेमौसम
बेवजह
पर जो भी है अच्छा है सब।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें