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कभी कभी ज़िन्दगी बिना आवाज़ शिकायत और सलाहियत दोनों अता फरमात…

कभी कभी ज़िन्दगी बिना आवाज़ शिकायत और सलाहियत दोनों अता फरमाती है। अभी जिस ola cab को बुक किया उसमें अनजाने इनसे मिलना हुआ। कैब में बैठते ही दिल धकक हुआ ।जाने क्यों मन डूबने लगा ।सोच में पड़ गई क्या और कौन सी जरूरत होगी कि इतने बुजुर्ग को कैब चलानी पड़ रही। पीछे बैठे मुझे ग्लानि का भाव जाने क्यों उमड़ रहा। बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा। सोच रही जो खुद इतने कर्मठ हैं इस उम्र में ज़िन्दगी ने उनको अपनी परवाह में क्यूँ नहीं रखा? क्यूँ कम पड़ गई ? इस जद्दोजहद को क्या नाम दिया जाना चाहिये? जो लोगों को उनके गंतव्य तक ले जा रहा... उनकी राह बन रहा क्या ज़िन्दगी ने उसके लिए एक खरा जिगर नहीं बनाया जो इन्हें पुरसुकून बुढापा दे। इनकी जंग कितने मैदानों के लिए और होनी है अभी? मन में फफोले पड़ गए मेरे। साँस नहीं आ रही तो हेडफोन लगा लिया है.... ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें बज रहा। *आधा रास्ता कट जाने के बाद एक ख़्याल ये भी आ रहा कि जो इंसान अभी मेरा सारथी है वो लोहे के मन का होगा। उम्र को चपेड़ लगाना मुश्किल है पर मैं देख रही इनको चुप्पी से तमाचा जड़ते हुए। आपको मेरी दुआ लगे। एक घंटे के सफ़र में आपने पूरी ज़िंदगी का सिनेमा दिखा दिया। एक बेहद खूबसूरत जज़्बे से तआरुफ़ कराने का शुक्रिया ...ए सुबह
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें