कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3113

भाषा / Language

सच और झूठ

सच और झूठ.... * रख दूँ सामने तो सच.... बार बार रखूँ तो झूठ। *दो ही अक्षरों से बनते हैं सच और झूठ बस वो नीचे की मात्रा वजन बढ़ा देती है। ये अक्षर दोष नहीं.... आज तक की संवेदनाओं में सबसे बड़ा manufacturing defect है। *सच धीरे से कहा तो झूठ जैसा असर दिया। झूठ धीरे से भी कहा तो असर सच का किया। *सच ज़ोर ज़ोर से कहा जाए तो शोर लगता है। झूठ ज़ोर ज़ोर से कहा जाए तो घोर लगता है। *सच अगर अंदर बहुत अंदर परतों में छिपा कर रखा हो तो झूठ का मुवक्किल है। झूठ अगर रेशा रेशा उघाड़ कर रखा हो तो सच की पैरवी है। *हम अक्सर सच को झूठ की तरह और झूठ को सच की तरह कहते जाते हैं। कितने सच्चे कितने झूठे ...इसका हिसाब ज़िन्दगी देती है। *सच भी छोटे से छोटे झूठ को मिटा कर ही बनता है और झूठ बड़े से बड़े सच को गला कर। *बस अंतस की अवनिका का जादू है... जिंदगी की बयार में सच या झूठ किसको ज्यादा ढँक कर... किसको ज्यादा उघाड़ कर रखती है तुम्हारी रूह *केवल प्रेम में हमें सच झूठ कहने का अधिकार होना चाहिए । बस एक वही माफ़ कर सकता है इनके बीच पनपे भेद को। झूठ पाटना सबके बस की बात नहीं। *मेरे सच में तुम्हारे झूठ से रोज़ छोटी छोटी दुनिया बनती है। इस बड़ी सी दुनिया में मेरी तुम्हारी तरह सच में अनेक छोटी छोटी दुनिया हैं। ये बात सच है ....इसके लिए तुम्हें मुझे एक रोज़ बरसों से बचाया हुआ झूठ बोलना ही पड़ेगा। बोलोगे ना झूठ? मैं सच में इसे सुनना चाहती हूँ। *मेरे सच में तुम दिखते हो और इस झूठ में भी तुम ... तुम मुझसे बने मेरी ही सच्ची - झूठी मरीचिका हो। *ज्यादा सच कभी कभी प्रेम को बाँध देता है। थोड़ा झूठ उसे उन्मुक्त कर देता है। मैं झूठ का साथ दूँगी... हमेशा। *सच और झूठ को पानी करना बहुत आसान है .... प्रेम में पड़ जाओ मैं पड़ गयी हूँ। *सच अगाध है और झूठ अपार इसमें से प्रेम उठा लो। 😊😊😊आज मन फिर पिछले बरस जैसा है। हम खुद में बरबस कितने बार लौटते हैं ।ये हम एक रोज़ बाद गिनना भी छोड़ देते हैं। अपना हाथ और अपना ही मन खुद पकड़ना सीख लेना चाहिए। काम आता है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें