भाषा / Language
चल इश्क़ मत बख्श
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चल इश्क़ मत बख्श ...
मुझे इश्क़ की सलाहियत ही अता कर....
मुझसे पलट कर जाते हुए उससे रोज़ यही कह कर अपना दिन बंद कर देती हूँ। इश्क़ सुबह फिर मेरे सज़दे में मिला दिखता है।
रोज़ सोचती हूँ ...
अल्फ़ाज़ों से परहेज़ करूँगी।
फिर सोचती हूँ...
कैसे उसे इश्क़ से लबरेज़ करूँगी?
हम को उनसे है वफ़ा की उम्मीद😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें