कल्पनाशब्दों के बीच
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मेरे पास एक सूरज है पर वो कभी कभी निकलता है। बाक़ी दिन वो चा…

मेरे पास एक सूरज है पर वो कभी कभी निकलता है। बाक़ी दिन वो चाँद होता है....सबका सोचती हूँ ...मैंने प्रेम में ध्रुव तारे पर क्यूँ नहीं उँगली रखी कम से कम दिशा तो मेरी होती। *इन पंक्तियों में ढ़ेर सारा इंतज़ार भेज रही । तुम उलाहना ही समझना।😊 तुमको भी बेचैनी मुबारक। My probably transformed to definetely... This is love for me😊😊 *कार में ऊलजलूल लिखना सफ़र पार करा देता है। स्कूल पास लगता है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें