भाषा / Language
मैंने हमेशा अपना कहा माना।
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मैंने हमेशा अपना कहा माना।
प्रेम में तुमको कभी न देखा।
देखती तो मांगती....
अपना हिस्सा
खूब से भी खूब बढ़कर मन दिया।
कभी कुछ न पाया।
है ही क्या पलट कर देने को ....
एक आवाज़ है मेरे पास
तुम्हारे पास तो वो भी नहीं ।
मेरे पास पहले डर था....खो देने का।
अब निडर हूँ....कि जान गई हूं आशा बस निराशा का विलोम शब्द है।
इसका प्रेम से कोई लेना देना नहीं।
अप्रेम भी प्रेम से ही निकलती धारा है।
दुखने के लिए कभी न करो प्रेम
ये दुख दुख कर सीख गई हूं।अब कह सकती हूँ...
प्रेम किया जाना चाहिए सच कहने के लिए....खुद से
हम दो इंसान हैं ...
एक जैसे
तुम न मुझसे ज्यादा हो न एक रत्ती कम
प्रेम जिसमें भी भरा हो मुझमें या तुम में
जिसके लिए जितना भी भरा हो ...
एक रोज़ छलकेगा।
हम बने ही बहा ले जाने के लिए हैं।
हृदय की मिट्टी
और
मिट्टी से बने पहाड़
निश्चिन्त रहो...न तुम हो
न तुम थे पर
ईश्वर होगा एक रोज़ मेरा।
शुभरात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें