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रचना 3015

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हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद .... उम्मीद एक बहुत ही छोटी सी गोली है जो ज़ुबान पर रखी ही इस लिए जाती है कि घुल जाए। साँस आए। उम्मीद में हम दोनों एक दूसरे को बहुत देर तक देखते हैं। तस्वीर की इस देख में दोनों पूरे नहीं दिखते पर एक उम्मीद पूरी पूरी दिखती है कि कभी मिलेंगे तो थोड़े और पल मुट्ठी में कैद कर लेंगे। एक लंबी उदासी को गले लगाएंगे। एक छोटी सी हँसी बाजुओं में भर लेंगे। एक महक सीने में गोल मोल करके रख लेंगे । उम्मीद ये भी है कि बरसों बाद मैं तुम्हें वो नहीं मिलूंगी जो कहा था और तुम मुझे वो कभी नहीं कहोगे जो कहा था कभी कहोगे। हम कैसे नाप लेंगे ये इंच भर दूरी ।इतने बरसों में इतना कुछ भूले हैं ।ये पास आना याद रहेगा क्या? उम्मीद एक डोंगी है....बिन पतवार जो मन से चलती है। इस पानी की लहरों का रेत को भिगोना एक आदत है ।उम्मीद तो एक जोड़े प्रेमियों की है कि कोई आये, भिगोए और गुज़र जाए। तुम्हारा पता नहीं..... मैं रोज़ सूखी रेत को खुद से झाड़ कर इस उम्मीद में नंगे पैर खड़ी रहती हूँ कि एक रोज़ साथ चलेंगे गीले गीले स्पर्श पर। तुम कल्पना लिखना मुझपर मैं शुक्रिया रख दूँगी तुम पर। उम्मीद ...सुबह सुबह मुझमें उगे सफेद फूल हैं। शाम तक मेरी नज़र से उतर जाते हैं।मुझे भूल में रहने की लत लग गई है। तुम मुझे ऐसे ही रख लो ना...उम्मीद में बहुत प्रेम भी रखे रखे काई हो जाता है। शुभरात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें