भाषा / Language
मेरे इंतज़ार के झरोखे तो हों पर दरवाज़े न हों
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मेरे इंतज़ार के झरोखे तो हों पर दरवाज़े न हों
कभी यूं भी तो हो...
*अक्सर मन होता है कि पूछ लूँ कैसे हो?कहां हो?
फिर ये सोच कर मुस्कुरा देती हूँ कि उससे भी क्या ही होगा तुम्हारा कल्पना।
कब सीखोगी ?
मन न कहना
होंठ बस मुस्कुराने के लिए बने हैं तुम्हारे।😊
कहा न करो
दोस्ती का दिन मुबारक।
साया बना रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें