कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2983

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मेरे इंतज़ार के झरोखे तो हों पर दरवाज़े न हों

मेरे इंतज़ार के झरोखे तो हों पर दरवाज़े न हों कभी यूं भी तो हो... *अक्सर मन होता है कि पूछ लूँ कैसे हो?कहां हो? फिर ये सोच कर मुस्कुरा देती हूँ कि उससे भी क्या ही होगा तुम्हारा कल्पना। कब सीखोगी ? मन न कहना होंठ बस मुस्कुराने के लिए बने हैं तुम्हारे।😊 कहा न करो दोस्ती का दिन मुबारक। साया बना रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें