भाषा / Language
सच है
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सच है ....
हर रोज़
अपने लिखे हुए की
आख़री पंक्ति में
तुम्हें ही धर के
सो जाती हूँ
कि अगली सुबह
तुम ही मिलो
मुस्कुराते हुए .....
फिर पहली पंक्ति में
लिखे जाने के लिए
मुझमें....
मेरी सोच में जिए जाने के लिए
* आख़िर इस दर्द की दवा क्या है.... 😊😊
दिल ए नादान तुझे हुआ क्या है
शाम भर लूप में यही ग़ज़ल चल रही ।कविता जी आप की आवाज़ मन को थाप देती है। आराम आ जाता है। आपको भर भर दुआएं ।आप की आवाज़ शिफ़ा है मेरी😊
आप सब भी सुनें...
शुभ रात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें