भाषा / Language
तुम पर न मेरी आसक्ति है न ही तुम मेरी आवश्यकता... तुम से एक…
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तुम पर न मेरी आसक्ति है न ही तुम मेरी आवश्यकता... तुम से एक अनंत प्रियता है । ऐसी जैसी कभी किसी से न हुई हो।
मेरी पसंद हो ....
जिसका कोई मूल्य नहीं।
मैं बाँध ही नहीं सकती तुम्हें अप्राप्य में
तुम बस हो....
तुमको लेकर मन में कोई हेर फेर कोई लचीलापन आ ही नहीं सकता।
अंधेरे से उजाला चिपका होता है।
अलग चाह कर भी नहीं होगा।ठीक वैसे ही मेरी चाहना रही है तुमसे।
हर प्रयास व्यर्थ रहा छिन्न भिन्न हो जाने का।
मन का एक ही आद्र हिस्सा है ...और उसकी सारी आद्रता तुम्हारी।
इतना कुछ तो घटता रहता है आसपास ....
तुम क्यूँ नहीं घट जाते मुझसे।
अगर दो लोग एक बराबर प्रेम नहीं करते तो संभव है तुम मुझसे ज्यादा प्रेम करते हो....
ऐसा मैं मान चुकी हूं।इसको कोई नहीं मिटा सकता।
दो लोगों के बीच गहरा प्रेम प्रश्न उत्तर की तरह होता है। दोनों एक दूसरे को उसी व्याकुलता से ढूंढते हैं ताकि समग्र हो सकें।
तुमको नया नाम दिया है .....
*अनघ *
देखो मैं भी अब तुम्हारे लिए अनहद हूँ।
*लिखना बस मन झाड़ देना है मेरे लिए।
उजला दिन है। रोज़ जैसा ....
पर मन रात बनकर चाँद को खत लिखने का था....लिख दिया ।
नहीं होने को क्या नहीं हो सकता...
अगर मैं रात नहीं हूँ अभी तो तुम भी तो चाँद नहीं हो 😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें