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इक तरफ़ा हो रहे प्रेम का अंत नहीं होता

इक तरफ़ा हो रहे प्रेम का अंत नहीं होता..... एक नदी जो ताले से छूटना तो पसंद करती है पर अपनी छूट को किसी चाबी का मोहताज नहीं रखती। अक्सर हम प्रेम को पराया नाम देते हैं ....जबकि इससे इतर प्रेम खुद में रमे रहने वाली छूट है। इसमें दूजा उतना ही अपना है जितना तुम पराए। अपने हिस्से की छूट कायम रखो.... इक तरफ़ा उस तरफ़ बागबान हो न हो उस तरफ़ बियाबान ही हो। तुम्हें सब्र मुबारक तुम्हें सब मुबारक
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें