कल्पनाशब्दों के बीच
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मेरे पास जो कम सा है वो तुझ सा है

मेरे पास जो कम सा है वो तुझ सा है तेरे पास जो नम सा है वो मुझ सा है एक रोज़ तुम्हें देखेंगे कि बात करेंगे ..... इसी उधेड़ बुन को लिख रहे हैं। लिख लिख कर पहन रहे हैं । पहन पहन गुज़र रहे हैं। वक़्त को इतना बेवक्त होते हुए देखना दुखने लगा है। पाकर खोया खोया सा एहसास कहाँ रखूं..... बेचैनी ,शोर,उदासी सभी तो बाग़ी हो चले हैं। मेरे हिस्से में तू नहीं है....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें