भाषा / Language
चटक ....चटकारे
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चटक ....चटकारे
खुद को रोज़ कुछ पल समय दो
दुःख सूखने उलीचने में समय लगता है।
पापड़ और अचार का अंतर पहचानो
😊
बंटने से पहले जरूर सोचो...
किसको दे रहे अपना हिस्सा
आप पिज़्ज़ा थोड़े ही हो।
काटा और बांटा ...उड़ाया
😊
एक रोज़ हम थक जाते हैं
उसी रोज़ हम जग जाते हैं
तलछट को छू कर जो ऊपर आजाये उसे पूरी नहीं पूरा कहते हैं।
😊
जो उलझा उलझा रहता है वो रेशमी क्या होगा। चटपट निपट जाएगा।
अरे मैग्गी समझ लो।
😊
*जब भूख लगी होतो कविता थोड़े ही खाई जाती है।पक पक की जाती है।😊😊😊
आओ पास्ता खाएं.....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें