भाषा / Language
बारिशों से इसलिए भी इश्क़ रास आया कि उस तरफ का मिज़ाज जरा रूख…
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बारिशों से इसलिए भी इश्क़ रास आया कि उस तरफ का मिज़ाज जरा रूखा है।
तुम्हारी चुप को चुना और चाहा कि तुमको जी भर नेह दूँ कि बस उस चुप में ही तुम्हारी ना लागू नहीं होती.....सिर्फ़ मेरे लिए।
तुम्हारे एकांत को गले लगाया और चाहा कि डूब जाऊं तुम में कि बस उस एकाकी पन में कोई तुम पर हक़ नहीं रखता ....सिवाय मेरे
तुम्हारी ना सुनी दूर से और तुम्हें फिर भी चाहने की हर संभव कोशिश जारी रखी कि दूर से दूरी का पता नहीं चलता ,सिवाय मन को
तुम्हारी चाहना में चाहा कि इस हवा पर ढ़ेर चुम्बन काढ़ दूँ कि जब भी छुए कोई ... रस बूंदे बरसे सिर्फ़ मेरी
तुम्हें ताउम्र थामे रखने के लिए अपना ही ख़्वाब चुनूँ कि उससे बेहतर कोई सीमा लांघ ही नहीं सकता... सिवाय मेरे।
*मेरा प्रेम और अध्यात्म एक साथ चलते हैं....
तुम्हारी चुप्पी इनसे उड़ती चरण रज है।
मैं इससे सन चुकी हूं।
शुभरात💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें