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नदी अगर किसी रोज़ मुड़ने का मन बनाएगी तो सागर तक क्यूँ जाएगी

नदी अगर किसी रोज़ मुड़ने का मन बनाएगी तो सागर तक क्यूँ जाएगी.... खुद में समा जाएगी लौटना .....मुड़ना थोड़े ही होता है। क्या सुनकर मुस्कुरा रही वो लिंक साँझा है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें