कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2880

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मन के पत्थर भारी हैं

मन के पत्थर भारी हैं... कुछ बादल बस अभी आकाश को उछाले हैं। एक भरम तो रखा रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें