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आज बहुत दिनों बाद अल्मोड़ा बाज़ार जाना हुआ। आज कल बाज़ार 11 बज…

आज बहुत दिनों बाद अल्मोड़ा बाज़ार जाना हुआ। आज कल बाज़ार 11 बजे तक ही खुल रही यहां। मैं और विनोद पैदल पैदल चल पड़े कि कोई गाड़ी क्या ही मिलेगी। कुछ देर बात करते चलते रहे। विनोद को जाने क्या सूझी कहने लगे लिफ्ट मांगते हैं जल्दी पहुँच जाएंगे। मस्ती मस्ती में सब को हाथ देते रहे। कोई क्यों बिठाता ...? कोरोना का ख़ौफ़ जो फैला ठेरा। इतने में पीछे से एक ट्रक आया। विनोद ने हाथ दिया और वो दयालु ड्राइवर रुक भी गया। मैंने कहा...है राम ट्रक? इसमें कैसे बैठेंगे? इतना ऊंचा इसमें चढूंगी कैसे? विनोद बोले.... अरे तुम चलो तो सही। मैं थोड़े गुस्से में थोड़े हंसते हुए ट्रक में चढ़ कर आगे बैठ ही गयी। मतलब की सोच के ही हँसी आ रही थी कि ये भी आज कर के देख लिया। ट्रक की फ्रंट सीट में ड्राइवर दाज्यू की पूरी गृहस्थी दिख रही थी ।कुकर स्टोव ,दराती, कपड़े,बर्तन, भगवान जी, डिब्बे,कम्बल...एक पूरा छोटा चलता घर। विनोद मेरे गुस्से में दबी हँसी को बाहर लाने के लिए बोले चलो एक सेल्फ़ी हो जाये।तुम भी क्या याद करोगी ....ट्रक में बिठा दिया तुमको😊😊😊 छोटे से सफर में वीडियो भी बन गया । मैंने कहा हद्द ही हो तुम।😊😊😊 पर सच कहूं ...मज़ा तो आया।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें