कल्पनाशब्दों के बीच
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इतने गहरे उतरे हो मुझमें कि अपनी ही डूब का अंदाज़ा नहीं रहा

इतने गहरे उतरे हो मुझमें कि अपनी ही डूब का अंदाज़ा नहीं रहा.... अभी कुछ देर पहले झमझम बारिश हुई। शाम छत पर ही गुजरती है।देखते सोचते पढ़ते हुए। मेरे पास पहाड़ , बादल और ढेर सारा आकाश है अभी। खूबसूरती क़ैद करना बेकार की बातें हैं ..... करती रहती हूं। लोग कहेंगे....ये सुंदर है ।वो सुंदर है। कहने दो। जो कहे....तुम सुंदर हो ।तुम्हारी सादगी से मैं सुंदर हूँ। उसके गले लग लो। उसकी सुंदरता में भीग जाओ। नज़र भर नज़ारे। फोटोग्राफी मुझे आती नहीं है पर मन उड़ाना आता है। उड़ा रही....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें