कल्पनाशब्दों के बीच
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आभासी दोस्ती निभाने के चक्कर में अनायास ही लोग कविता को छलत…

आभासी दोस्ती निभाने के चक्कर में अनायास ही लोग कविता को छलते हैं। ये शब्दों का तेरा मेरा का व्यापार क्यों है यहां? दूसरों को देख कर भेड़ क्यूँ बन जाना? क्या जरूरी है कहना? भरम में रहना और दूसरों को रखना दोनों ही उथले हैं। सब तक पहुंचना ,पुचकारना... कितनी बड़ी बेचारगी है। कविता से ....खुद से छल नहीं किया जाना चाहिए। कविता बस सरल ,श्रेष्ठ और कालजयी होती है। इसे कुछ अलग लिखने के चक्कर में जयकारी बनाने की व्यर्थ कोशिशें fb पर दिखती हैं।लोग उनपर मत्था भी टेकते हैं। हम झूठ क्यों बोलते हैं? सब पर थोड़ा थोड़ा मरने से बेहतर है कुछ एक पर शिद्दत से मरो। अगर किसी का लिखा पढ़कर आप के मन में कोई प्रश्न, कोई संवेदना, कोई हूक,कोई दर्द,कोई विचार, कोई चेहरा न उभरे तो व्यर्थ है सब। आपको थोड़ा सा अच्छा बनना ही चाहिए अपने पसंदीदा का लिखा पढ़कर।कुछ न कुछ सीखना जरूर चाहिए अच्छा पढ़कर। उसके प्यार में थोड़ा सा और पड़ना ही चाहिए।😊😊😊😊 मैं झूठ नहीं बोल सकती । जो आसान है वही सुंदर और शाश्वत है मेरे लिए। *कल से मन में कुछ कुछ चल रहा था। लिख दिया। आराम आये शायद अब।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें