कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2839

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हमने जानबूझ कर साँझा रंज उठाया

*हमने जानबूझ कर साँझा रंज उठाया पर इश्क़ अपना अपना रखा हम हश्र से शुरू हुए लोग हैं। *कागज़ पर ही मिलते हैं कागज़ पर ही छूट जाते हैं हम तुम इसे सिलसिला कहूँ या कविता? *उसके लिए लिखो कल्पना जो तुम्हें देख कर मुस्कुराता हो ...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें